पाठ्यक्रम: GS1/सामाजिक मुद्दे, लैंगिक समानता
संदर्भ
- सर्वोच्च न्यायालय ने आशंका व्यक्त की कि मासिक धर्म के दौरान सवेतन अवकाश को अनिवार्य बनाने वाला कानून युवा महिलाओं के करियर को हानि पहुँचा सकता है और उन्हें समान अवसरों से वंचित कर सकता है।
मासिक धर्म अवकाश क्या है?
- मासिक धर्म अवकाश से आशय उस सवेतन या अवैतनिक अवकाश से है जो महिलाओं को मासिक धर्म के दौरान स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं के समय दिया जाता है, जैसे:
- डिस्मेनोरिया (Dysmenorrhea): तीव्र मासिक धर्म पीड़ा
- एंडोमेट्रियोसिस (Endometriosis): ऐसी स्थिति जिसमें गर्भाशय की परत जैसी ऊतक गर्भाशय के बाहर विकसित हो जाती है
सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय की मुख्य विशेषताएँ
- ऐसा कदम महिलाओं में यह मानसिक बाधा उत्पन्न कर सकता है कि वे पुरुषों से कमतर हैं क्योंकि वे मासिक धर्म के दौरान कार्य नहीं कर सकतीं।
- मुख्य न्यायाधीश ने कानूनी रूप से लागू होने वाले वैधानिक अधिकार और नियोक्ताओं द्वारा महिलाओं के प्रति स्वेच्छा से अपनाई गई नीतियों के बीच अंतर स्पष्ट किया।
- न्यायालय ने इस संबंध में ओडिशा, कर्नाटक और केरल जैसे राज्यों की “स्वैच्छिक” पहल का स्वागत किया, जहाँ राज्य संचालित विश्वविद्यालयों एवं संस्थानों में छात्राओं को मासिक धर्म पीड़ा के लिए वार्षिक 60 दिनों तक का अवकाश दिया जाता है।
सवेतन मासिक धर्म अवकाश के पक्ष में तर्क
- लैंगिक-संवेदनशील कार्यस्थलों को बढ़ावा: महिलाओं की जैविक वास्तविकताओं को स्वीकार करता है और कार्यस्थल पर समावेशिता एवं सहानुभूति को प्रोत्साहित करता है।
- यह नीतियाँ लैंगिक-उत्तरदायी श्रम सुधारों की दिशा में कदम बढ़ाती हैं।
- संवैधानिक सिद्धांतों के अनुरूप: भारतीय संविधान के अनुच्छेद 42 का समर्थन करता है, जो राज्य को न्यायसंगत और मानवीय कार्य परिस्थितियाँ सुनिश्चित करने का निर्देश देता है।
- यह व्यावसायिक सुरक्षा, स्वास्थ्य एवं कार्य परिस्थितियाँ संहिता, 2020 के प्रावधानों के साथ भी सामंजस्य स्थापित करता है।
- उत्पादकता और कल्याण में सुधार: पीड़ा या असुविधा के समय विश्राम की सुविधा मिलने से प्रदर्शन और मनोबल बेहतर होता है।
- स्वास्थ्य और मानवाधिकार दृष्टिकोण: महिलाओं के स्वास्थ्य, गरिमा और शारीरिक स्वायत्तता के अधिकार को सुदृढ़ करता है।
- मासिक धर्म का कलंक-निवारण: कार्यस्थल नीति में मासिक धर्म स्वास्थ्य को मान्यता देना सामाजिक वर्जनाओं को तोड़ने और लैंगिक समानता को बढ़ावा देने में सहायक है।
- वैश्विक सामंजस्य: जापान, दक्षिण कोरिया, इंडोनेशिया, ताइवान और स्पेन जैसे देशों में समान नीतियाँ लागू हैं।
विरोध में तर्क
- कार्यस्थल भेदभाव का जोखिम: नियोक्ता महिलाओं को कम उत्पादक या अधिक खर्चीला मानकर नियुक्ति या पदोन्नति से बच सकते हैं।
- यह अनजाने में लैंगिक पूर्वाग्रह को खत्म करने के बजाय उसे सुदृढ़ कर सकता है।
- अनौपचारिक क्षेत्र का प्रभुत्व: भारत की लगभग 88% कार्यबल अनौपचारिक क्षेत्र में है, जहाँ औपचारिक अवकाश नीतियाँ प्रायः अनुपस्थित हैं।
- निजी क्षेत्र में क्रियान्वयन चुनौतियाँ: विविध उद्योगों में अनुपालन और निगरानी कठिन हो सकती है।
- अपर्याप्त दायरा और असमानता: प्रति माह एक दिन का अवकाश गंभीर मासिक धर्म विकारों से पीड़ित महिलाओं के लिए पर्याप्त नहीं हो सकता।
- राष्ट्रीय ढाँचे का अभाव: राज्यों और क्षेत्रों में नीति असंगति उत्पन्न हो सकती है।
- नियोक्ताओं की वर्तमान जिम्मेदारियाँ: मातृत्व लाभ अधिनियम, 1961 और कुछ संस्थानों में क्रेच सुविधा जैसी जिम्मेदारियाँ पहले से ही मौजूद हैं।
भारत में वर्तमान मासिक धर्म अवकाश नीतियाँ
- भारत में मासिक धर्म अवकाश पर कोई राष्ट्रीय कानून नहीं है, लेकिन कुछ राज्यों ने नीतियाँ लागू की हैं।
- बिहार प्रथम राज्य था जिसने 1992 में सरकारी कर्मचारियों के लिए मासिक धर्म अवकाश लागू किया।
- कुछ कंपनियाँ जैसे ज़ोमैटो और स्विगी ने स्वैच्छिक मासिक धर्म अवकाश नीतियाँ अपनाई हैं।
आगे की राह
- महिलाएँ कार्यस्थलों और नेतृत्व भूमिकाओं में समानता के लिए प्रयासरत हैं, और मासिक धर्म अवकाश का प्रावधान उनके विरुद्ध भी प्रयोग किया जा सकता है।
- मासिक धर्म अनुभवों की विविध प्रकृति को स्वीकार करना आवश्यक है।
- कुछ विशेषज्ञ निश्चित अवकाश दिनों के बजाय लचीले कार्य घंटे, घर से कार्य करने के विकल्प या कार्यस्थलों पर बेहतर मासिक धर्म स्वच्छता सुविधाओं का समर्थन करते हैं।
- व्यक्तिगत आवश्यकताओं के अनुरूप सहयोग और समायोजन समावेशिता को बढ़ावा देता है, साथ ही कठिन मासिक धर्म चक्र से गुजर रही महिलाओं की विशिष्ट जरूरतों को भी संबोधित करता है।
स्रोत: TH
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संक्षिप्त समाचार 13-03-2026